घर


मैं देखूँ अंत तक , उस पार है मेरा घर बादलों सा करूँ तय सफ़र, थोड़ा उड़ते हुए, थोड़ा तैर कर । है ठहराव सा इस लम्हे में ,साँसें टकराए है हवाओं से मैं परिंदा सा , बहका हुआ ,तकता फिरूँ, अपना घर । आवाज़ मेरी, मेरे मन में चिल्लाए है, गाए है धुन बिरहा…

Day 46. छत


एक वो दौर था जब हम छोटे थे , जब रात को खाने के बाद बिजली की कटौती होती थी , और सब छत पर भागते थे । लैम्प का शीशा चमका के और मिट्टी का तेल भरकर तैय्यार रखते थे, किसी के मकान ऊँचे नहीं थे और अपनी छत पर ख़ूब हवा लगती थी,…

Day 45. क्या मन नही करता ?


क्या कभी स्कूल जाने का मन नहीं करता ? बस्ता लगाने का , जिसमें एक तरफ़ किताबें और दूसरी तरफ़ कौपीयों के नीचे दबा हुआ टिफ़िन रखते थे । क्या मन नहीं करता है फिर से प्रार्थना स्थल पर सीधी लाइन में लगना और आँखे बंद करके प्रार्थना करना, और कभी कभी आँखे खोलकर देखना…

Day 44. प्रिये


जब घने अंधेरे होंगे दूर सवेरे होंगे होंठों की लालिमा पर ग़मों के पहरे होंगे तुम रहना मेरे पास प्रिये मैं दिया बन जलूँगा रातों को राख करूँगा कोमल से चेहरे पर मीठी मुस्कान बनूँगा जब तूफ़ान के साये होंगे जो मुश्किलों की टोकरी साथ लाए होंगे, टूटे हुए पत्ते, हवा में उड़के हमारे आँगन…

Day 43. ये जीवन है


जीवन तो रंगो का मेला है ऊपर वाले का ये खेला है है धूपों को गरमी तो ठंडी छाया भी है है दुःख अनेक तो सुख पाया भी है फूलो की माला गले में पैरों में काटे है कभी ढोल नगाड़े कभी सन्नाटे हैं उजियारी भोर के कितने सुंदर नज़ारे हैं काली अँधियारी रातों के…

थोड़े हम, थोड़े तुम


छूठे हाथो में टूटे वादों में अधूरी बातों की पूरी यादों में थोड़े बिखरे हम , थोड़े तुम, अँधियारी शब में, बेचैनी बेहद मे, चलते क़दमों की बुझती आहट में खोये खोये हम, थोड़े तुम अनजान रास्तों में जागती नज़रों में, ढूँढे ना मिलते , अपने साये के पते , ये जो रात चुप है,…

Will English remain the global language in the future?


    It’s quite non anxious to say that English has been dominating the languages for a very long time. It’s dominance over other languages is bright visible and reflects a monopoly in most of the countries world-wide. No need to say that English has been a core bridge which fills the gap between the…

तेरे आने से


सारे ग़मों के घर जो दिल में बने थे बिन कहे जो मन में रहे थे बिन रुके जो साँसों में चले थे, सारी सुर्ख हथेली जो ठंडी थी सर्द रात में जिसको गर्मी किसी के साथ की नहीं मिली थी जिसको चाहत किसी की याद की कभी रही थी तेरे आने से सब बदला…