Day 46. छत


एक वो दौर था जब हम छोटे थे , जब रात को खाने के बाद बिजली की कटौती होती थी , और सब छत पर भागते थे । लैम्प का शीशा चमका के और मिट्टी का तेल भरकर तैय्यार रखते थे, किसी के मकान ऊँचे नहीं थे और अपनी छत पर ख़ूब हवा लगती थी,…

Day 45. क्या मन नही करता ?


क्या कभी स्कूल जाने का मन नहीं करता ? बस्ता लगाने का , जिसमें एक तरफ़ किताबें और दूसरी तरफ़ कौपीयों के नीचे दबा हुआ टिफ़िन रखते थे । क्या मन नहीं करता है फिर से प्रार्थना स्थल पर सीधी लाइन में लगना और आँखे बंद करके प्रार्थना करना, और कभी कभी आँखे खोलकर देखना…

Day 44. प्रिये


जब घने अंधेरे होंगे दूर सवेरे होंगे होंठों की लालिमा पर ग़मों के पहरे होंगे तुम रहना मेरे पास प्रिये मैं दिया बन जलूँगा रातों को राख करूँगा कोमल से चेहरे पर मीठी मुस्कान बनूँगा जब तूफ़ान के साये होंगे जो मुश्किलों की टोकरी साथ लाए होंगे, टूटे हुए पत्ते, हवा में उड़के हमारे आँगन…