घर


मैं देखूँ अंत तक , उस पार है मेरा घर बादलों सा करूँ तय सफ़र, थोड़ा उड़ते हुए, थोड़ा तैर कर । है ठहराव सा इस लम्हे में ,साँसें टकराए है हवाओं से मैं परिंदा सा , बहका हुआ ,तकता फिरूँ, अपना घर । आवाज़ मेरी, मेरे मन में चिल्लाए है, गाए है धुन बिरहा…