Day 44. प्रिये


जब घने अंधेरे होंगे दूर सवेरे होंगे होंठों की लालिमा पर ग़मों के पहरे होंगे तुम रहना मेरे पास प्रिये मैं दिया बन जलूँगा रातों को राख करूँगा कोमल से चेहरे पर मीठी मुस्कान बनूँगा जब तूफ़ान के साये होंगे जो मुश्किलों की टोकरी साथ लाए होंगे, टूटे हुए पत्ते, हवा में उड़के हमारे आँगन…