थोड़े हम, थोड़े तुम


छूठे हाथो में

टूटे वादों में

अधूरी बातों की

पूरी यादों में

थोड़े बिखरे हम , थोड़े तुम,

अँधियारी शब में,

बेचैनी बेहद मे,

चलते क़दमों की

बुझती आहट में

खोये खोये हम, थोड़े तुम

अनजान रास्तों में

जागती नज़रों में,

ढूँढे ना मिलते ,

अपने साये के पते ,

ये जो रात चुप है,

सन्नाटा जो है पसरा

महकती सुबह को आए

हुआ जो है अरसा,

बहते वक़्त के,

बाँध के तले ,

भूले बिसरे हम, थोड़े तुम

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